परीक्षापत्रम्

June 15, 2007

1.      झय्, यर्, इच्, अल् प्रत्याहारान् सूत्रनिर्देशपूर्वकं साधयत।

2.      अ, य, स वर्णानां बाह्यप्रयत्नाः लेख्याः

3.      सवर्णसँज्ञासूत्रं टिसँज्ञासूत्रञ्च सार्थमुल्लिख्य य, म, श, अ वर्णेषु कयोरपि द्वयोः स्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नञ्च लिखत।

4.      ऋ , औ, भ, ल वर्णानां स्थानानि प्रयत्नांश्च विलिख्य अल्  प्रत्याहारं सूत्रनिर्देशपूर्वकं साधयत ।

5.      क, प, उ वर्णानां स्थानानि प्रयत्नांश्च विलिख्य, ‘अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः’ इत्यस्य अर्थं उदाहरणञ्च लिखत।

6.      आदिरन्त्येन सहेता, परः संनिकर्षः संहिता इति सूत्रद्वयस्य अर्थौ विलिख्य आभ्यन्तरप्रयत्नस्य भेदान् लिखत।

7.      अच् प्रत्याहारं संसाध्य ‘ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः’ इति सूत्रस्य सोदाहरणं अर्थं लिखत।

8.      ‘सुप्तिङन्तं पदम्’ इति सूत्रं सोदाहरणं व्याख्याय र, श, ह वर्णेषु कयोरपि द्वयोः पृथक्-पृथक् बाह्यप्रयत्नान् लिखत।

9.      अ, ट, ल, श वर्णानां स्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नं च लिखित्वा ऋकारस्य त्रिंशद् भेदान् प्रदर्शयत ।

10.  ‘अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः’ इत्यस्मिन् सूत्रे ‘अप्रत्ययः’ इत्यस्य पदस्य अभिप्रायं स्पष्टीकुरुत।

11.  ‘अदर्शनं लोपः’ इत्यस्मिन् सूत्रे ‘लोपः’ इत्यस्य पदस्य विवेचनं कुरुत ।

12.  सवर्ण,संहिता,संयोगसंज्ञाविधायकसूत्राणि विलिख्य, इ-घ-ज-ष वर्णानां स्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नञ्च लिखत।


पाठ 3 – सावर्ण्यम्

June 12, 2007

10 तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्                                 1.1.9

Let two letters having the same place of articulation and that are uttered with the same effort in the mouth be called  सवर्ण with each other.

ऋलृवर्णयोर्मिथ: सावर्ण्यं वाच्यम्

कात्यायन however remarks,  “That the letters ऋ and लृ are सवर्ण of each other must be stated”. 

This form of expression viz., वाच्यम्, बोध्यम्, वक्तव्यम्, distinguishes the supplementary remarks of कात्यायन. They are called वार्तिक.

The purpose of a वार्तिक is understood as under:

“सूत्रे उक्तानुक्तदुरुक्तचिन्ताकरत्वं वार्तिकत्वं”

                               Place of articulation (स्थानम्)

स्थानम् अच् <————हल्————>
कण्ठः क, ख, ग, घ, ङ विसर्जनीय
तालु च, छ, ज, झ, ञ
मूर्धा ट, ठ, ड, ढ, ण
दन्ताः लृ त, थ, द, ध, न
ओष्ठौ प, फ, ब, भ, म उपध्मानीय
नासिका (additional) ञ, म, ङ, ण, न
कण्ठतालु ए, ऎ
कण्ठोष्ठम् ओ, औ
दन्तोष्ठम्
जिह्वामूलम् जिह्वामूलीय
नासिका अनुस्वार

The effort of articulation is considered to be of two types: Internal (आभ्यन्तर) and external (बाह्य).

आभ्यन्तरप्रयत्नचित्रम्

स्पृष्ट्म् ईषत्स्पृष्टम् विवृतम् ईषत्विवृतम् संवृतम्
क च ट त प अ  ए ह्रस्व ‘अ’ प्रयोगे
ख छ ठ थ फ इ  ओ
ग ज ड द ब उ  ऎ
घ झ ढ ध भ ऋ  ऑ ह्
ङ ञ ण न म लृ

बाह्यप्रयत्नविवेक:

विवार:, श्वास:, अघोष: संवार:,नादः, घोष: अल्पप्राण: महाप्राणः उदात्त:, अनुदात्तः, स्वरितः
क, ख, श ग, घ, ङ, य क, ग, ङ, य, अ, लृ ख, घ, श अ, ए
च, छ, ष ज, झ, ञ, ब च, ज, ञ, ब, इ, ए छ, झ, ष इ, ओ
ट, ठ, स ड, ढ, ण, र ट, ड, ण, र, उ, ओ ठ, ढ, स उ, ऎ
त, थ द, ध, न, ल त, द, न, ल, ऋ, ऎ थ, ध, ह ऋ, औ
प, फ ब, भ, म, ह प, ब, म,       ऑ फ, भ लृ

सर्वेषां वर्णानां प्रत्येकं चत्वारो बाह्यप्रयत्न:

11 अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्यय:                 1.1.69

अनुवृत्ति –  स्वं रूपं

अण् प्रत्याहारः उदित् च सवर्णस्य ग्राहको भवति, स्वस्य च रूपस्य, प्रत्ययं वर्जयित्वा। अत्र अण् परेण णकारेण गृह्यते ।

Let a letter, denoted by the प्रत्याहार अण्, where it is an operand (and not a प्रत्यय) and similarly, a letter followed by a  ‘उ’ (उदित्), denote all its सवर्ण letters too.

कु, चु, टु, तु, पु are called उदित् .

कु represents क, ख, ग, घ and ङ. Likewise,

चु represents च, छ, ज, झ, ञ

टु represents ट, ठ, ड, ढ, ण

तु represents त, थ, द, ध, न

पु represents प, फ, ब, भ, म

अ represents 18 varieties. Likewise, इ and उ.

ऋ represents 30 varieties (its own 18 and 12 of लृ)

Similarly, लृ represents 30 varieties (its own 12 and 18 of ऋ )

ए, ऎ, ओ, औ represent 12 varieties each.

Through the distinction of nasal and non-nasal, य, व, ल are twofold. By this sutra, the non-nasal form of each implies both (nasal and non-nasal).

12 पर: सन्निकर्ष: संहिता                           1.4.109

Let the closest proximity of letters be called संहिता. This is nothing but संधि in ordinary usage.

13 हलोऽनन्तरा: संयोगः                       1.1.7

Let consonants unseparated by vowels be called संयोग or conjunct consonants.

14 सुप्तिङन्तम् पदम्                          1.4.14

Let a term ending in सुप् or in तिङ् be called a पद.

सुप् (#137) is a noun ending and तिङ्  (#408) is verb ending. पद is essentially something which is inflected or conjugated.

Thus ends the section on definitions.

इति सँज्ञाप्रकरणम्

 

 


पाठ 2 – स्वराः

June 11, 2007

5 ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः                  1.2.27

अनुवृत्ति – 

Let a vowel whose time (or prosodial length) is that of short u, long u or prolated u, be called accordingly short (ह्रस्व), long (दीर्घ) or prolated (प्लुत).

These are again threefold, according to the accent that they carry, as follows

6 उच्चैरुदात्तः                             1.2.29

अनुवृत्ति – अच्

A vowel uttered in high tone is said to be उदात्त

7 नीचैरनुदात्तः                             1.2.30

अनुवृत्ति – अच्

A vowel uttered in low tone is said to be   अनुदात्त 

8 समाहारः स्वरितः                         1.2.31

अनुवृत्ति – अच्

A vowel uttered in a combination of  उदात्त and अनुदात्त is said to be स्वरित.

The application of three accents to each of the three lengths of the vowel gives rise to nine varieties for each vowel.

9 मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः                  1.1.8

अनुवृत्ति – 

That which is pronounced with the mouth and nose together is called अनुनासिक. Thus each vowel can be further divided into two types, depending on whether they are nasal or non-nasal.

Thus of the vowels अ, इ, उ, ऋ there are 18 types each.

Of the vowel लृ, there are 12 types since there is no दीर्घ लृ

Of the vowels ए, ओ, ऎ, ऑ, there are 12 types each as they do not have a ह्रस्व counterpart.


पाठ 1 – प्रत्याहाराः

June 10, 2007

 

 

1 हलन्त्यम्                                   1.3.3

अनुवृत्तिः  उपदेशे, इत्

अर्थः  उपदेशेऽन्त्यं हल् इत्संज्ञकं भवति।

उदाहरणः   अ इ उण् इति णकारस्य। ऋलृक् इति ककारस्य।

 

टिप्पणि: हस्य ल् हल् षष्ठीतत्पुरुषः। हल् च हल् च  = हल् सरूपाणामित्यनेन एकशेषः, जातिविवक्षायामेकवचनञ्च, अनया रीत्या हल् प्रत्याहारो निष्पद्यते।

“धातु सूत्र गणोणादि वाक्य लिङ्गानुशासनम् ।

आगम प्रत्ययादेशा उपदेशः प्रकीर्तितः ॥” इत्यभियुक्तोक्तं वेदितव्यम्।

 

2 अदर्शनं लोपः                                                 1.1.60

अनुवृत्तिः  इति

अर्थः  यद् भूत्वा न भवति तद् अदर्शनं (= अनुपलब्धिः) वर्णविनाशस्तस्य लोप इति संज्ञा भवति, अर्थात् प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसंज्ञकं भवति।

उदाहरण:  

 

टिप्पणि: अर्थस्येयं संज्ञा न शब्दस्य।

 

3 तस्य लोपः                                         1.3.9

अनुवृत्तिः  

अर्थः  तस्येत्संज्ञकस्य लोपो भवति।

उदाहरण:  

टिप्पणिः   

 

 

4 आदिरन्त्येन सहेता                                               1.1.71

अनुवृत्तिः  स्वं रूपम्

अर्थः आदिः अन्त्येन इता (इत्संज्ञकेन वर्णेन) सह तयोर्मध्यस्थानां स्वस्य च रूपस्य ग्राहको भवति।

 

उदाहरण:  अण् = अ इ उ। अक् = अ इ उ ऋ लृ। अच् = अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ।

 

टिप्पणिः  

 

शिवसूत्र प्रत्याहार
अ इ उण् अण्
ऋ लृक् अक्, इक्, उक्
ए ओंङ् एङ्
ऐ औच् अच्, इच्, एच्, ऎच्
ह य व रट् अट्
लण् अण्,इण्, उण्, यण्
ञ म ङ ण नम् अम्, यम्, ङम्, ञम्
झ भञ् यञ्
घ ढ धष् झष्, भष्
ज ब ग ड दश् अश्, हश्, वश्, झश्, जश्, बश्
ख फ छ ठ थ च ट तव् छव्
कपय् यय्, मय्, झय्, खय्, चय्
श ष सर् यर्, झर्, खर्, चर्, शर्
हल् अल्, हल्, वल्, रल्, झल्, शल्

अक्षरसमाम्नाय:

May 27, 2007

अथ सँज्ञाप्रकरणम्

नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम् |

पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धांतकौमुदीम् ||

 

 अक्षरसमाम्नाय:, शिवसूत्राणि

अ इ उण्

ऋ लृक्

ए ओंङ्

ऐ औच्

ह य व रट्

लण्

ञ म ङ ण नम्

झ भञ्

घ ढ धष्

ज ब ग ड दश्

ख फ छ ठ थ च ट तव्

कपय्

श ष सर्

हल्

इति माहेश्वराणि सूत्राणि अणादिसंज्ञार्थानि। एषामन्त्या इत:। हकारादिषु अकार: उच्चारणार्थ:। लण्मध्ये तु इत्संज्ञक:|

महेश्वर-प्रसादलब्धानीत्यर्थ:। तथा चोक्तम्

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम् ।

उद्धर्तुकाम: सनकादिसिद्धान्   एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥